बर्फ वाली शाम

#lovepoetry,#myfeelings,

बर्फ वाली शाम थी वह,

जब वह मुझे मिला था पहली बार,

ना! मिला नहीं था,

देखा था उसे,

पहाड़ों के पीछे से आता दिखा था मुझे,

चरवाहों से बातें करते देखा अपना सा लगा था,

फिर दो तीन मुलाकातों में लगा बिलकुल अलग सा था वो,

वो अकसर कहा करता था,

कि मुझे काफी अरसा हुआ है जिंदगी जीये हुए,

चलना जिंदगी थोड़ी है!

वो कभी नहीं बता पाता दर्द अपना,

जितनी गहरी बातें उतनी ही गहरी आँखे,

एक शाम जब वो मिला,

कुछ तो था उसकी आँखों में जो अभी भी ठहरा हुआ है मुझमें,

कुछ अलग सा था,

फिर एक दिन वो बर्फ वाली शाम फिर आयी,

वो मुसकुराता हुआ सा,

हँसता हुआ सा,

गहरी आँखों से मुझे निहारता रहा,

मैं डूबती रही,

इठलाती रही,

लगा कि ये शाम अब कभी ना जाए,

वक्त यहीं रूक जाए,

देखो वो झुमके मेरे कानों में अभी भी झूल रहे हैं,

हाँ वही जो तुमने मुझे दिए थे,

मुझे नहीं पता था कि वो आखिरी शाम थी,

ना तुम आये ना बर्फ वाली शाम,,

वो बर्फ वाली शाम फिर कभी नहीं आई ।

Published by Aradhana Singh

Poet by heart by soul

36 thoughts on “बर्फ वाली शाम

      1. जी धन्यवाद शायद इतना अच्छा नहीं लिखता हूं पर प्रयास करता हू कुछ नया लिखने का..
        Thanks for the great compliment आप भी बहुत अच्छा लिखते है
        इसी तरह आप सुझाव देते रहना ओर हम सुधार.. Thanks again

        Liked by 1 person

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