औरत

# women’s poetry,

सबसे पहले तो मैं सारे पुरुष जाति को सम्मान अर्पित करती हूँ क्योंकि मैं भी किसी पुरुष की पत्नी,बेटी,बहन हूँ ।मेरी इस कविता का उद्देश्य पुरुष का निरादर नहीं है ।अगर स्त्री रचना करती है तो पुरुष के बगैर रचना अकल्पनीय है,गर्व की बात है कि हमारा समाज विकसित हो रहा है औरतों के प्रति नजरिया बदल गया है । दो टूक कहूँ तो यह कविता ऐसे समाज का चित्रण है जहाँ अभी भी औरत केवल वंश वृद्धि और उपभोग की वस्तु है ।🙏

प्रसव पीड़ा सहे जो?

क्या वही औरत है!

जो पालन करे क्या वही औरत है?

सहनशीलता की मूर्ति ?

क्या यही पराकाष्ठा है औरतों की?

हे!पुरुष क्या मूर्ख इतना हो गया तू!

अब स्त्रीत्व का मापदंड!

कितनी पराकाष्ठा? कितनी शक्ति?

तूने कहा कि तू सह!

तूने कहा कि तू ढृढ बन,

तभी तू औरत है,

ना सहे तो रच ना पाएगी संसार अपना,

ना बना सकेगी मुझे अपना,

औरत भी कितनी भोली है,

चुटकी भर सिंदूर से भरती उसकी झोली है

हे पुरुष!तूने कितना सताया है,

कितना मूर्ख उसको बनाया है ।

तू कितना प्रिय है उसका,

क्या तूने कभी प्रेम जताया है?

हे पुरुष!

जा भोग सौंदर्य उसका,

क्या कभी भावनाओं को उसकी छू पाया है?

Published by Aradhana Singh

Poet by heart by soul

16 thoughts on “औरत

      1. मैंने आपकी लेखनी हो नमन किया आपकी भवाभिव्यक्ति अच्छी है। 👌

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      2. नही ऐसा कुछ नहीं मैं बस लेखन की सारी विधाओं पर अपना समय देता हूँ। मुझे लेखन में बेहद रुचि है। हाँ आप लेखन में नियमानुसार कुछ सीखना चाहें तो आप मेरी पोस्ट से सीख सकती हैं। मैं ज़्यादातर रचनाऍं नियमानुसार लिखता हूँ।

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    1. आप सच में अगर लेखन में रुचि रखती हैं तो आप मुझसे संपर्क कर सकती हैं। मैं लेखन की सारी विधा पर कार्य करता हूँ। जैसे कि छन्द ग़ज़ल शेर शायरी।

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