बारिश को कई देर तक देखा करती थी, वो निर्विकार, चुपचाप,
बैठी रहती कई देर तक,
ना जाने कयों शायद किसी मंथन में
उसकी बातें सिर्फ वो हीं जान सकती थी
उसकी भावना भी, और शायद उसकी डायरी, उसकी डायरी में उसकी सारी बातें उकेरी होती थी, आदतन अपनी बातें भावनाए वो उकेरती थी कागज पर ।
बेहदख़ूब👏
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Dhanyawad 😊
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Dhanyawad
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लिखते रहिये और हो सके तो मेरी पोस्ट भी पढ़ियेगा। आशा करता हूँ पसंद आएगा आपको।
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जी जरूर ।
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🙏
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