मेरी कल्पना में एक दुनिया

यह कविता मेरे हृदय के काफी करीब है

काश! कि पूरी धरती एक परिवार होती,हाँ

वसुधैव कुटुंबकम् “

ओह!मैंने सोचा है कि मानवता हीं एक जाति है ।ना कोई गोरा है ना कोई काला है,

मैंने सोचा है कि एक ऐसा ग्रह है जहाँ एक हीं भाषा है,वो भी प्रेम की,

जहाँ मैंने सुमति देखी है,

जहाँ सब एक हैं,

वहाँ धर्म के नाम पर बँटा नहीं है कोई भी,

यह दुनिया इतनी खूबसूरत है कि, अभिशाप नहीं है किसी का भी जीवन यहाँ,

सभी खुश है संतोष की सीमा नहीं है जहाँ,

उस जगह पर कोई प्रतिशोध नहीं है,

जहाँ हर चार कदम पर ना शहर बदलता है,ना कालोनी बदलती हैं ,

ना देश बदलता है ना वेशभूषा बदलती हैं,

यहाँ सच है कि सब एक है, हाँ मैंने “वसुधैव कुटुंबकम्” का एक सपना देखा है ।

Published by Aradhana Singh

Poet by heart by soul

7 thoughts on “मेरी कल्पना में एक दुनिया

  1. मुझे तो लगता है कि मानव सबसे ज़्यादा स्वार्थी है। फिर भी काश आपका सपना सच हो।

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