सलाइयाँ ली थी मैंने धैर्य की, और धागे लिए थे, विश्वास के,फिर बुनती रही, वक्त बेवक्त, ना जाने कब, कैसे, कयों ये सलाइयाँ मिली,
ना जाने कब कैसे धागे मिले, विश्वास के,
मुश्किलों को नजरअंदाज कर मैं बुनती रही, विश्वास के धागे से शाँत मैं बुनती रही, क्या बात थी कि सलाइयाँ कभी कमज़ोर ना पङी,
पर धागे कइ बार टूटे, पर मैं जोङती रही उन धागों को,साथ ही गाँठो को छुपाती भी रही, और फिर विश्वास के धागे से विश्वास ही बना,
विश्वास की लिहाफ़,
वो लिहाफ़ फिर प्रेम की चादर बन गयी थी, मेरा पूरा आवरण हीं प्रेम हो चला था, कयोंकि मैंने सलाइयाँ ली थी धैर्य की,और धागे लिए थे विश्वास के,,और अब ये प्रेम की चादर ढक रही है मुझे विश्वास की लिहाफ़ भी ।

अति सुंदर।
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Jee dhanyawad
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