स्री

सिसक उठती हूँ अकेले में कभी सोचकर

क्या गलती थी उसकी जिसे यूँ ही नोचा गया,

हूँ बिलख उठती यह सोचकर कि कयों स्री हीं निशाना है हर बार,

सोचो जो प्रेम गीत लिखती थी स्वछन्द उङाने कल्पना में भरती थी

जब भी चाहा पसारना पंख कयों उसे क़ैद किया गया स्त्री मरयादा है तो कयों तङपायी गयी?

इच्छापूरक की इच्छा कयों दबायी गयी,?

सम्मान की जगह भावनात्मक ठेस पहुंचायी गयी, तङप उठती हूँ मैं यह सोचकर स्त्री कितनी भी स्वाभिमानी हो हमेशा स्त्री हीं रूलायी गयी ।

Published by Aradhana Singh

Poet by heart by soul

6 thoughts on “स्री

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