(कृष्ण के लिए मेरे हृदय में प्रेम तरूणावस्था से रहा है,,,,)
मैंने बहुत ढूँढा तुम्हें जाने कहाँ कहाँ
ढूँढा तुम्हें तारों के टिमटिमाते प्रकाश में, चंद्रमा की दूधिया रोशनी में पर तुम नहीं मिले,
कहीं नहीं था तुम्हारा आस्तित्व,
मैंने बहुत ढूँढा तुम्हें जाने कहाँ कहाँ ढूँढा तुम्हें सुगंधमयी फूलों में, अपनी हर तान हर सुरों में,
पर तुम नहीं मिले कहीं नहीं था तुम्हारा आस्तित्व, तभी जैसे दिल सोकर जागा था, महसूस किया कि तुम तो मेरे दिल में हो मेरे रग- रग में हो ,मेरे रोम- रोम में हो जरूरत थी महसूस करने की, जो आज हुआ है, मुझे तुमसे तुमसे सिर्फ तुमसे कृष्णा प्यार हुआ है ।
_आराधना सिंह