मैं अकेली हूँ

मैं अकेली हूँ बहुत अकेली, बस तुम हाथ बढ़ाना,ज्यादा नहीं बस सुन लेना दो चार बातें मेरी और कुछ कह लेना,

आत्मा का उत्थान जरूरी है और विकास भी, पर उसका क्या जो आत्मा हीं मरने तुल्य हो, जरूरत है कि कोइ उसे सीचे,,

फिर भी कोई ना मिले,

तुम मुझे मिलो बस एक बार आग्रह है, कि बस एक बार देखना मेरी तरफ़ और पढना मेरे नयन ,नहीं नहीं आँसू नहीं है मेरे नयन में, बस आग्रह है, आशा है ,निवेदन है ,मेरे नयन में, मैं अकेली हूँ बहुत अकेली, बस तुम हाथ बढ़ाना, ज्यादा नहीं सुन लेना दो चार बातें मेरी और कुछ कह लेना ।

Design a site like this with WordPress.com
Get started